हवा में गुलाल के रंग उड़ते धुंधले दिख रहे थे. खिड़की खोलकर बाहर देखा तो बच्चों की एक टोली जिसमें सब रंगे हुए थे, वो गुलाल उछाल
रही थी. उनके पीछे चल रहे थे कुछ उम्र में बड़े लोग.
शैतान, बच्चे होते हैं पर नटखट वो लोग भी कम नहीं थे. जो मिला उसे रंग दिया, नहीं मिला तो टोली में ही उछाल दिया.
ध्यान से देखा तो रंग के पीछे के चेहरे पहचान आये. एक था जो मोहल्ले का धोभी था तो एक बिजली का काम करता था. जो सबसे ज्यादा रंग हुआ था वो शायद सुबह कूड़ा उठाने आता था.
रंग भेद तो होता है मगर रंग को एक करते हुए पहली बार देखा है.
होली है !!!