Monday, January 24, 2011

अंगीठी

सुलगते कोयलों के सहारे गुज़रती रात में, लिट्टी-बाटी भून रहे थे. दोस्तों के साथ कुछ नए पुराने गानों की लडियां बुन रहे थे. तभी एक ख्याल आया की बचपन में सर्दियों की हर रात ऐसी ही होती थी और तब हम बड़े होने की जिद्द करते थे. बड़े होकर आज ऐसा क्या पा लिया की इस अंगीठी के पास हम वही बचपन ढूंढ रहे हैं.

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