Thursday, June 9, 2011

एक अजनबी रिश्ता

रिश्ते अजनबी भी होते हैं.
ना कहने के, ना सुनने के ये रिश्ते,
ना सवाल करते, ना जवाब मांगते ये रिश्ते.
बस एक नज़र से बनते हैं ये अजनबी रिश्ते
मायने कुछ भी नहीं, पर ना मिलने पर,
कमी का एहसास कराते ये रिश्ते.

मैंने भी बुना एक ऐसा रिश्ता,
ना बोलता है, ना सुनता है,
बस मुस्कुराता है वो रिश्ता.
कभी अपनी टोली के साथ ठहाके लगाकर,
अपनी ख़ुशी का एहसास करता है वो रिश्ता.
तो कभी पार्क में अकेले तेहेलकर,
अपनी तन्हाई की शिकायत करता है वो रिश्ता.
ना कभी मैंने जाना, ना कभी उसने पुछा,
'भाई रहते कहाँ हो?'
मेरे लिए तो पार्क के मोड़ पर मिलता है वो रिश्ता.

पिछले कुछ दिनों से खल रही थी कमी
उस पार्क के मोड़ पर, टोली तो दिखती थी पर
मैं वो ठहाका दूंढ़ रहा था.
परेशान था मैं शायद, सोचा रहा था की क्या हुआ
दुआ थी कि उसी मोड़ पर फिर मिले मुझे वो रिश्ता
सच जानकार, क्यों छलके थे दो आंसू मेरी आँखों से?
आखिर एक अजनबी से ही तो था वो अजनबी रिश्ता.

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