Friday, November 18, 2011

लेखक की मेज़


मेरे नए किराए के मकान में, एक पुरानी मेज़ रखी थी.
धूल की मोटी चादर ओढ़े अरसे से सोयी हुई थी.
चादर हटते ही नींद से जाग गयी. अलसाई हुई थी.
उसपर जमें स्याही के दाग सहमे हुए थे.
कुछ हुआ था शायद वहां पर. कुछ बुरा.
मेज़ की बायीं तरफ एक छोटी दराज़ थी.
अपने नाम सी ही बंद उसमें कई राज़ थे.
खोलकर देखा तो उसमें कुछ शब्द मिले
नब्ज़ थामकर देखा, सांसें रुकी हुई थी उनकी.
एक कहानी ने दम तोड़ा था उस मेज़ पर.
अल्फाजों का स्याह खून काफी बहा था.
एक लेखक की मेज़ थी वो शायद, अब तो दराज़ पर
उस स्याही के बस कुछ दाग बचें हैं.

No comments:

Post a Comment