मैंने देखा उस जानिब, मेरी हसरत को सामने सात तालों से बँधा था 'रीऐलिटी शो' वालों ने। उसकी चाभियाँ वही पास लटकी थी।
वक़्त की साँस कम होती रही, पर ज्यों ही इक ताला खुलता वक़्त की सांसें बढ़ जाती। मेरे भी एक हाथ में इक ताला था।जेब टटोली तो हाथ के ताले की चाभी मिली। हाथ खोला वक़्त की सांसें बढ़ गयी।छः ताले खुल गए। बस अब सातवाँ ताला खोलना था। देखा मैंने उस जानिब। मेरी हसरत पूरी होने वाली थी। पर सातवीं चाभी नहीं मिली। जेबें, तारें, सब तलाशा। वक़्त की सांसें मद्धम होने लगी और उम्मीद दम तोड़ने लगी। मेरी हसरत ने मुस्कुरा के कहा "सातवीं चाभी है ही नहीं"। सच कह रही थी वो। ना धागों में ना जेबों में कहीं नहीं थी।
वक़्त की सांसें अब रुक चुकी थीं। 'रीऐलिटी शो' जैसी ज़िंदगी में वो वक़्त दुबारा नहीं आएगा। अब वो हसरत कभी पूरी नहीं होगी
वक़्त की सांसें अब रुक चुकी थीं। 'रीऐलिटी शो' जैसी ज़िंदगी में वो वक़्त दुबारा नहीं आएगा। अब वो हसरत कभी पूरी नहीं होगी
सातवीं चाभी
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