तुम अक्सर पूछते हो न, की कौन हूँ मैं?
मिट्टी क्या है मेरी?
लोगों से मिले तजुरबे की मिट्टी है।
दोस्तों के ठहाकों की मिट्टी है।
एक मिट्टी है माँ-बाप से छिड़ी बहस की।
सोन्धी मिट्टी है बच्चों की तोतली ज़ुबान की।
सूखी, सख़्त मिट्टी भी है। अब उनमें दरारें पड़ने लगी हैं।
एक रेत है, जिसमें तुम्हारे टूटे वादों के काँच हैं,
चलता हूँ तो अक्सर चुभ जाते हैं।
धूल है जो अब एहसासों पे जम चुकी हैं।
मिट्टी क्या है मेरी?
लोगों से मिले तजुरबे की मिट्टी है।
दोस्तों के ठहाकों की मिट्टी है।
एक मिट्टी है माँ-बाप से छिड़ी बहस की।
सोन्धी मिट्टी है बच्चों की तोतली ज़ुबान की।
सूखी, सख़्त मिट्टी भी है। अब उनमें दरारें पड़ने लगी हैं।
एक रेत है, जिसमें तुम्हारे टूटे वादों के काँच हैं,
चलता हूँ तो अक्सर चुभ जाते हैं।
धूल है जो अब एहसासों पे जम चुकी हैं।
बस ये हूँ मैं। यही है मेरी मिट्टी।
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