Saturday, July 16, 2016

फाँस

तागे में जुड़े तागा जैसे,
नैनो में जुड़े नैना जैसे,
मन में फाँस चुभे है ऐसे, क्योंकि
हाथों में जुड़ा हाथ ना वैसे,
मँझधार में नैया रुकी हो जैसे,
अब उस पार जैय्ये कैसे।

Wednesday, July 6, 2016

मिट्टी

तुम अक्सर पूछते हो न, की कौन हूँ मैं?
मिट्टी क्या है मेरी?
लोगों से मिले तजुरबे की मिट्टी है।
दोस्तों के ठहाकों की मिट्टी है।
एक मिट्टी है माँ-बाप से छिड़ी बहस की।
सोन्धी मिट्टी है बच्चों की तोतली ज़ुबान की।
सूखी, सख़्त मिट्टी भी है। अब उनमें दरारें पड़ने लगी हैं।
एक रेत है, जिसमें तुम्हारे टूटे वादों के काँच हैं,
चलता हूँ तो अक्सर चुभ जाते हैं।
धूल है जो अब एहसासों पे जम चुकी हैं।

बस ये हूँ मैं। यही है मेरी मिट्टी।

Wednesday, March 9, 2016

मैंने देखा उस जानिब, मेरी हसरत को सामने सात तालों से बँधा था 'रीऐलिटी शो' वालों ने। उसकी चाभियाँ वही पास लटकी थी। 
वक़्त की साँस कम होती रही, पर ज्यों ही इक ताला खुलता वक़्त की सांसें बढ़ जाती। मेरे भी एक हाथ में इक ताला था।जेब टटोली तो हाथ के ताले की चाभी मिली। हाथ खोला वक़्त की सांसें बढ़ गयी।छः ताले खुल गए। बस अब सातवाँ ताला खोलना था। देखा मैंने उस जानिब। मेरी हसरत पूरी होने वाली थी। पर सातवीं चाभी नहीं मिली। जेबें, तारें, सब तलाशा। वक़्त की सांसें मद्धम होने लगी और उम्मीद दम तोड़ने लगी। मेरी हसरत ने मुस्कुरा के कहा "सातवीं चाभी है ही नहीं"। सच कह रही थी वो। ना धागों में ना जेबों में कहीं नहीं थी।
वक़्त की सांसें अब रुक चुकी थीं। 'रीऐलिटी शो' जैसी ज़िंदगी में वो वक़्त दुबारा नहीं आएगा। अब वो हसरत कभी पूरी नहीं होगी

सातवीं चाभी

Friday, October 16, 2015

हंसी और मुस्कराहट

हंसी फूल की तरह होती है,
खिलती है, मुरझा जाती है.
मुस्कराहट खुशबू है,
हंसी को पहचान दे जाती है.


हंसी सूरज की तरह होती है,
तेज़ ही सही, पर ढल जाती है.
मुस्कराहट चाँद है,
रात भर साथ रह जाती है.


हंसी तड़के की तरह है,
लगती है तोह सबको आवाज़ आती है.
मुस्कराहट ज़ायका है,
देर तक ज़बां पे रह जाती है.

हंसी मुसाफिर की तरह होती है,
मंज़िल पर पहुँच कर रुक जाती है.
मुस्कराहट सफर है,
तजुर्बे की तरह याद रह जाती है,

Wednesday, September 23, 2015

ले चल मुझे


बस कहीं ले चल मुझे।
लहर पर उछलते पत्ते की तरह,
हवा में तैरती पतंग की तरह,
बिना मंज़िल के सही,
पर कहीं ले चल मुझे।

सीपी में सोये मोती की तरह,
दिल में दबी ख्वाहिश की तरह,
सबसे छुपा के सही,
पर कहीं ले चल मुझे

बटुए में पड़े स्टैम्प की तरह,
बातों में किये वादों की तरह,
सब भुला के सही,
पर कहीं ले चल मुझे।

चांदनी में रखी शबनम की तरह,
आँखों में रखे आंसू की तरह,
बरस जाने से पहले सही,
बस कहीं ले चल मुझे।

-निशीथ

Tuesday, January 20, 2015

मजाल

रंग हो या ढंग हो,
जीन्स चाहे तंग हो,
मेरी पसंद के आगे,
तेरी सोच की क्या मजाल है।

टॉप मेरा बैकलेस्स हो,
शर्ट मेरी स्लीवलेस्‍स हो,
मेरी स्टाइल के आगे ,
तेरी हिम्मत की क्या मजाल है।

टैटू मेरी बाज़ू पर हो,
पियर्सिंग मेरी बॉडी पर हो,
मेरी मर्ज़ी के आगे,
तेरी नज़रों की क्या मजाल है.

Friday, November 18, 2011

लेखक की मेज़


मेरे नए किराए के मकान में, एक पुरानी मेज़ रखी थी.
धूल की मोटी चादर ओढ़े अरसे से सोयी हुई थी.
चादर हटते ही नींद से जाग गयी. अलसाई हुई थी.
उसपर जमें स्याही के दाग सहमे हुए थे.
कुछ हुआ था शायद वहां पर. कुछ बुरा.
मेज़ की बायीं तरफ एक छोटी दराज़ थी.
अपने नाम सी ही बंद उसमें कई राज़ थे.
खोलकर देखा तो उसमें कुछ शब्द मिले
नब्ज़ थामकर देखा, सांसें रुकी हुई थी उनकी.
एक कहानी ने दम तोड़ा था उस मेज़ पर.
अल्फाजों का स्याह खून काफी बहा था.
एक लेखक की मेज़ थी वो शायद, अब तो दराज़ पर
उस स्याही के बस कुछ दाग बचें हैं.