Friday, November 18, 2011

लेखक की मेज़


मेरे नए किराए के मकान में, एक पुरानी मेज़ रखी थी.
धूल की मोटी चादर ओढ़े अरसे से सोयी हुई थी.
चादर हटते ही नींद से जाग गयी. अलसाई हुई थी.
उसपर जमें स्याही के दाग सहमे हुए थे.
कुछ हुआ था शायद वहां पर. कुछ बुरा.
मेज़ की बायीं तरफ एक छोटी दराज़ थी.
अपने नाम सी ही बंद उसमें कई राज़ थे.
खोलकर देखा तो उसमें कुछ शब्द मिले
नब्ज़ थामकर देखा, सांसें रुकी हुई थी उनकी.
एक कहानी ने दम तोड़ा था उस मेज़ पर.
अल्फाजों का स्याह खून काफी बहा था.
एक लेखक की मेज़ थी वो शायद, अब तो दराज़ पर
उस स्याही के बस कुछ दाग बचें हैं.

Thursday, June 9, 2011

एक अजनबी रिश्ता

रिश्ते अजनबी भी होते हैं.
ना कहने के, ना सुनने के ये रिश्ते,
ना सवाल करते, ना जवाब मांगते ये रिश्ते.
बस एक नज़र से बनते हैं ये अजनबी रिश्ते
मायने कुछ भी नहीं, पर ना मिलने पर,
कमी का एहसास कराते ये रिश्ते.

मैंने भी बुना एक ऐसा रिश्ता,
ना बोलता है, ना सुनता है,
बस मुस्कुराता है वो रिश्ता.
कभी अपनी टोली के साथ ठहाके लगाकर,
अपनी ख़ुशी का एहसास करता है वो रिश्ता.
तो कभी पार्क में अकेले तेहेलकर,
अपनी तन्हाई की शिकायत करता है वो रिश्ता.
ना कभी मैंने जाना, ना कभी उसने पुछा,
'भाई रहते कहाँ हो?'
मेरे लिए तो पार्क के मोड़ पर मिलता है वो रिश्ता.

पिछले कुछ दिनों से खल रही थी कमी
उस पार्क के मोड़ पर, टोली तो दिखती थी पर
मैं वो ठहाका दूंढ़ रहा था.
परेशान था मैं शायद, सोचा रहा था की क्या हुआ
दुआ थी कि उसी मोड़ पर फिर मिले मुझे वो रिश्ता
सच जानकार, क्यों छलके थे दो आंसू मेरी आँखों से?
आखिर एक अजनबी से ही तो था वो अजनबी रिश्ता.

Friday, March 18, 2011

होली है !!!


हवा में गुलाल के रंग उड़ते धुंधले दिख रहे थे. खिड़की खोलकर बाहर देखा तो बच्चों की एक टोली जिसमें सब रंगे हुए थे,  वो गुलाल उछाल 
रही थी. उनके पीछे चल रहे थे कुछ उम्र में बड़े लोग.
शैतान, बच्चे होते हैं पर नटखट वो लोग भी कम नहीं थे. जो मिला उसे रंग दिया, नहीं मिला तो टोली में ही उछाल दिया.
ध्यान से देखा तो रंग के पीछे के चेहरे पहचान आये. एक था जो मोहल्ले का धोभी था तो एक बिजली का काम करता था. जो सबसे ज्यादा रंग हुआ था वो शायद सुबह कूड़ा उठाने आता था.
रंग भेद तो होता है मगर रंग को एक करते हुए पहली बार देखा है. 
होली है !!!

Thursday, January 27, 2011

ख्वाहिशें भी दाम मांगती हैं.


एक शाम देखा की दिल के बटुए में कुछ पैसे पड़े हैं. सोचा कुछ ख्वाहिशें खरीद लूँ. कुछ पसन्द आयीं तो बटुआ खोला तब जाकर एहसास हुआ की अब तो ख्वाहिशें भी बहुत महंगी हैं.

Tuesday, January 25, 2011

26 जनवरी के plans

ऑफिस की कार पार्किंग में कुछ उडती-उडती बातें सुनी. पास खड़े थे लोग कुछ suit में तो कुछ suit boot में. बोल रहे थे की रात में पार्टी करेंगे, छुट्टी है कल ज्यादा सो लेंगे. सुबह शौपिंग न जाने का जो मलाल था वो 12 से 3 के film के plan से धुल गया. हवा में ताली बजाते हुए बोले,'C u 2morow'. वहीं खड़ा था एक बच्चा जो बेच रहा था कागज़ का तिरंगा इस उम्मीद में की साहब तो खरीद ही लेंगे...

Monday, January 24, 2011

अंगीठी

सुलगते कोयलों के सहारे गुज़रती रात में, लिट्टी-बाटी भून रहे थे. दोस्तों के साथ कुछ नए पुराने गानों की लडियां बुन रहे थे. तभी एक ख्याल आया की बचपन में सर्दियों की हर रात ऐसी ही होती थी और तब हम बड़े होने की जिद्द करते थे. बड़े होकर आज ऐसा क्या पा लिया की इस अंगीठी के पास हम वही बचपन ढूंढ रहे हैं.